रविवार, 6 जनवरी 2019



             (३९)     गुरु और स्वामी की सीख अवश्य  मानिये

सहज सुहृद  गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि |
सो  पछिताइ  अघाइ उर  अवसि होइ हित  हानि ||
अर्थ: स्वाभाविक ही हित चाहने वाले गुरु और स्वामी की सीख को जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता ,वह हृदय में खूब पछताता है और उसके हित की हानि अवश्य होती है |
        इसका तातपर्य है कि जिस व्यक्ति  अपने स्वामी एवं गुरु के द्वारा कही गई बातों को नहीं मानता   उसे  हानि अवश्य  ही होना है  क्योंकि यह हमारे परम हितेषी होते हैं , यह सदैव ही हमारा हित चाहने वाले होते हैं।  हम यदि इनकी बात पर ध्यान देते हैं तो हम आगे आनी वाली बहुत सी समस्याओं से बच सकते हैं। 









































जीने की  कला - इससे हमें सीखने को मिलता है कि  हमें सदैव अपने गुरुजन एवं स्वामी की सीख अवश्य मानना चाहिए। इससे हमारे जीवन में अवनति नही हो सकती और हम सदैव प्रगति के पथ पर अग्रसर रह सकते हैं।  

























































                                                          


शनिवार, 10 नवंबर 2018


   (३८) तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह.















      आवत ही हरषै नहीं नैनन नहीं सनेह|  







    तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह||

अर्थ: जिस जगह आपके जाने से लोग प्रसन्न नहीं होते हों, जहाँ लोगों की आँखों में आपके लिए प्रेम या स्नेह ना हो,  वहाँ हमें कभी नहीं जाना चाहिए, चाहे वहाँ धन की बारिश ही क्यों न हो रही हो|

        इसका तात्पर्य है कि जिस स्थान पर हमारे जाने से लोग प्रसन्न नहीं होते हैं अर्थात हमारी उपेक्षा की जाती है । ऐसे स्थान पर हमें भूलकर भी नहीं जाना चाहिए चाहे उस स्थान पर जाने से कित ना ही लाभ क्यों न हो रहा हो । ऐसी जगह हमारा अनादर हो सकता है जिससे हमारा नुकसान हो सकता है।


जीने की कला- इस दोहे के माध्यम से हमें सीखने को मिलता है कि हमें किस जगह जाना चाहिए उसका विचार पूर्व में करने के उपरान्त  ही जाना उचित है ।अन्यथा इससे हमें हानि हो सकती है ।      
                          

                                                  जय राम जी की

रविवार, 4 नवंबर 2018



(३७) तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए|







तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए|
अनहोनी होनी नही, होनी हो सो होए||

अर्थ: तुलसीदास जी कहते हैं, ईश्वर पर भरोसा करिए और बिना किसी भय के चैन की नींद सोइए| कोई अनहोनी नहीं होने वाली और यदि कुछ अनिष्ट होना ही है तो वो हो के रहेगा इसलिए व्यर्थ की चिंता छोड़ अपना काम करिए|
इसका तात्पर्य है कि हमें ईश्वर पर विश्वास रखना चाहिए, विश्वास मजबूत होना चाहिए जो किसी भी परिस्थिति में डगमगाना नहीं चाहिए।  यदि हमारा विश्वास अटल है तब हमें किसी भी प्रकार का भय एवं चिंता से ग्रस्त नहीं होना चाहिए । चिंता से भय उत्पन्न होता है जिससे व्यक्ति निराश हो जाता है । जो कि व्यक्ति के तन मन धन तीनों के लिए हानिकारक है ।
जीने की कला- इस चौपाई के माध्यम से हमें सीखने को मिलता है कि परम पिता परमात्मा पर विश्वास रखते हुए निर्भय रहकर चिंताओं का परित्याग करना चाहिए और अपने कार्य करते रहना चाहिए ।


                                          जय राम जी की


बुधवार, 31 अक्टूबर 2018

(३६) नवनि नीच कै अति दुखदाई








 नवनि नीच कै अति दुखदाई।जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई।
       भयदायक खल कै प्रिय वानी ।जिमि अकाल के कुसुम भवानी।

अर्थात -नीच ब्यक्ति की नम्रता बहुत दुखदायी होती हैजैसे अंकुश धनुस साॅप और बिल्ली का झुकना।दुश्ट की मीठी बोली उसी तरह डरावनी होती है जैसे बिना ऋतु के फूल।

 इसका तात्पर्य है कि आज के सामाजिक परिवेश में हम इस प्रकार के दुष्ट स्वाभाव वाले व्यक्ति बहुतायत मिलते हैं जो हमारे सामने तो नम्रता दिखाते हैं और पीठ पीछे वार कर  देते हैं , यह केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं।  अतः गोस्वामी जी द्वारा हमें इस प्रकार के व्यक्तियों से सावधान रहने के लिए चेतावनी दी गई है कि यदि इस प्रकार के दुष्ट व्यक्ति अचानक नम्र होकर हमसे मिलते हैं तो समझ जाना चाहिए कि यह हमें दुखदाई होने वाला है। यदि हम इनके  नम्रतापूर्ण व्यव्हार  को देखते हुए इनकी बातों में आकर कोई कार्य करते हैं तो यह हमारे लिए संकट उत्पन्न कर सकता है। 
जीने की कला -  इस चौपाई के माध्यम से हमें सीखने को मिलता है कि यदि दुष्ट व्यक्ति नम्र होकर व्यव्हार करता है तो हमें सावधान रहने की आवश्यकता है।  यह हमें संकट उत्पन्न कर सकता है। 

                                                                         जय राम जी की 



                                                                                             

शनिवार, 27 अक्टूबर 2018




(३५) एक स्थिति जब ज्ञानी और मूर्ख एक समान होते हैं। 


   काम क्रोध मद लोभ की, जौ लौं मन में खान ।
    तौ लौं पण्डित मूरखौं, तुलसी एक समान ।


तुलसी दास जी कहते हैं कि  जब तक काम,क्रोध, घमंड और लालच व्यक्ति के मन में भरे हुए हैं तब तक ज्ञानी और मूर्ख व्यक्ति के बीच में किसी भी प्रकार का अंतर नहीं होता है , दोनों एक जैसे हो जाते हैं।  इसका तात्पर्य है कि जब किसी व्यक्ति के मन में काम, क्रोध, लालच, घमंड आ जाता है तब वह व्यक्ति कितना भी ज्ञानी क्यों न हो उसका ज्ञान नष्ट होकर मूर्ख की तरह हो जाता है अर्थात  उसकी बुद्धी को भ्रष्ट हो जाती है जिससे उसके द्वारा किये गए कार्य मूर्खतापूर्ण ही हो जाते हैं।  इसीलिए गोस्वामीजी द्वारा इस स्थिति को ज्ञानी और मूर्ख की एक समान स्थिति कहा गया है। 
जीने की कला -  इससे हमें सीखने को मिलता है कि हम काम,क्रोध,लालच और घमंड से दूर रहते हुए अपने कर्तव्यों के पालन में लगे रहना चाहिए। हमें प्रयास करते रहना चाहिए कि यह हम से दूर ही रहें। 


                                                                        जय राम जी की 


शनिवार, 20 अक्टूबर 2018


    (३४ ) पर हित सरिस धर्म नहिं भाई  



                   पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥                                               निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर।

भावार्थ- भाई! दूसरों की भलाई के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरों को दुःख पहुँचाने के समान कोई नीचता (पाप) नहीं है।हमें हे तात! समस्त पुराणों एवं वेदों  का यह निर्णय  मैंने तुमसे कहा है, इस बात को पण्डित अर्थात ज्ञानी लोग जानते हैं॥

     इसका तात्पर्य है कि परहित अर्थात परोपकार (पर+उपकार) दूसरों के लिए समर्पित भावना से भलाई का कार्य करना ही सबसे बड़ा धर्म है।  परम पिता परमात्मा द्वारा रचित यह प्रकृति भी हमें यही सन्देश देती है।

        परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।

         परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम् ॥

   परोपकार के लिए बृक्ष फल देते हैं, परोपकार के लिए नदी वहती है, परोपकार के लिए गाय दूध देती है , परोपकार के लिए ही हमें यह शरीर प्राप्त  हुआ  है। 

इसके विपरीत दूसरों को कष्ट पहुँचाने के समानं कोई पाप अर्थात नीच कार्य नहीं है।  हमें मन ,वचन, कर्म से दूसरों को कष्ट नहीं पहुँचाना चाहिए क्योंकि इससे बड़ा अधर्म का कार्य दूसरा नहीं है। 

  अतः हमें  निःस्वार्थ भावना के साथ सदैव परोपकार के कार्य करते रहना चाहिए।


                                        जय राम जी की 



शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2018


(३३) मूर्खों के सामने मौन रहने में ही भलाई है। 

                 

               लसी पावस के समय, धरी कोकिलन मौन    

      अब तो दादुर बोलिहं, हमें पूछिह कौन  ||

अर्थ: बारिश के मौसम में मेंढकों के टर्राने की आवाज इतनी अधिक हो जाती है कि कोयल की मीठी बोली उस कोलाहल में दब जाती है| इसलिए कोयल मौन धारण कर लेती है| यानि जब मेंढक रुपी धूर्त व कपटपूर्ण लोगों का बोलबाला हो जाता है तब समझदार व्यक्ति चुप ही रहता है और व्यर्थ ही अपनी उर्जा नष्ट नहीं करता |       

इसका तात्पर्य है कि जिस स्थान पर धूर्त एवं कपट पूर्ण व्यक्तियों  की ही बातों को सुना जाता है, ऐसे स्थान पर समझदार व्यक्तियों को चुप ही रहना उचित है।  क्योंकि जब इस प्रकार के व्यक्ति एकत्रित होकर व्यर्थ की बात करते हैं तो उनकी बातों पर समझदार व्यक्ति ध्यान न देकर मौन धारण कर लेता है क्योंकि वह समझ जाता है कि धूर्तो के बीच में अपनी ऊर्जा को नष्ट करने में कोई लाभ नहीं है।
    आज के सामजिक परिवेश में भी जब इस प्रकार के  मूर्ख  व्यक्तियों का बोलबाला देखने को मिले तो समझदारी इसी में है कि उसी प्रकार  चुप रहें जिस प्रकार मेंढ़कों के टर्राने पर कोयल चुप हो जाती है ।
     
                                                                     
       
                                             

                                                जय राम जी की