आगे कह मृदु बचन बनाई |
पाछे अनहित मन कुटिलाई ।।
जाकर चित अहि गति समभाई ।
अस कुमित्र परिहरहिं भलाई।।
आगे कह मृदु बचन बनाई |
पाछे अनहित मन कुटिलाई ।।
जाकर चित अहि गति समभाई ।
अस कुमित्र परिहरहिं भलाई।।
'सकल पदारथ हैं जग माहीं।
करमहीन नर पावत नाहीं।
करम प्रधान विस्व करि राखा,
जो जस करई सो तस फलु चाखा
अर्थ - इस संसार को कर्म प्रधान बना रखा है | जो भी जैसा कर्म करते है उन्हें वैसा ही फल अर्थात परिणाम मिलता है |
इसका तात्पर्य है कि इस संसार में कर्म ही प्रधान है | जो अच्छे कर्म करते हैं उन्हें परिणाम भी अच्छे ही प्राप्त होते हैं, इसके विपरीत बुरे कर्मों का परिणाम भी बुरा ही प्राप्त होता है | यहाँ अच्छे कर्मों से तात्पर्य है कि जो काम भी आप कर रहे हैं उसको यह विचार करके करना कि कोई है जो हमें देख रहा है | हम जो भी कार्य करें उसे निःस्वार्थ भाव से पूर्ण ईमानदारी पूर्ण निष्ठा के साथ करेंगे तो यह कर्म आपके लिए निश्चित ही अच्छे परिणाम लेकर आएगा | कर्म केवल जीविकोपार्जन का साधन मात्र ही नहीं होना चाहिए| यहाँ कर्म से तात्पर्य आपके परिवार,आपके रिश्तेदार, आपके मित्र, आपका देश, के प्रति कर्तव्यों का पालन करना भी है |
जीने की कला - इससे हमें यह सीखने को मिलता है कि हमारे कर्म ही हमारी पहचान हैँ जो हमें उत्थान की ओर ले जाते हैं इसके विपरीत बुरे कर्म हमें पतन की ओर ले जाते हैं | हमें हमेशा अच्छे कर्म ही करना चाहिए |
जय राम जी की
पंडित प्रताप भानु शर्मा
तुलसी किएं कुंसग थिति, होहिं दाहिने बाम | कहि सुनि सुकुचिअ सूम खल, रत हरि संकंर नाम । बसि कुसंग चाह सुजनता, ताकी आस निरास । तीरथहू को नाम भो, गया मगह के पास ।।
अर्थात – गोस्वामी जी इन चौपाईयो के माध्यम से कहना चाहते हैं कि बुरे लोगों की संगती में रहने से अच्छे लोग भी बदनाम हो जाते हैं. वे अपनी मान प्रतिष्ठा खोकर छोटे हो जाते हैं. ठीक उसी तरह जैसे, किसी व्यक्ति का नाम भले हीं देवी-देवता के नाम पर रखा जाए, लेकिन बुरी संगती के कारण उन्हें वह मान-सम्मान नहीं मिलता है. जब कोई व्यक्ति बुरी संगती में रहने के बावजूद अपनी काम में सफलता पाना चाहता है और मान-सम्मान पाने की इच्छा करता है, तो उसकी इच्छा कभी पूरी नहीं होती है. ठीक वैसे हीं जैसे मगध के पास होने के कारण विष्णुपद तीर्थ का नाम “गया” पड़ गया |
इसका तात्पर्य है कि हमें कुसंग अर्थात बुरे लोगों के साथ नहीं रहना चाहिए यह हमारे और हमारे परिवार के लिए घातक सिद्ध हो सकता है |
जय राम जी क़ी
पंडित प्रताप भानु शर्मा
तुलसी जे कीरति चहहिं, पर की कीरति खोइ। तिनके मुंह मसि लागहैं, मिटिहि न मरिहै धोइ।।
अर्थ:
दोहे में महाकवि तुलसी दास जी कहते हैं कि जो लोग दूसरों की बुराई कर खुद प्रतिष्ठा पाना चाहते हैं, वे खुद अपनी प्रतिष्ठा खो देते हैं। वहीं ऐसे व्यक्ति के मुंह पर एक दिन ऐसी कालिख पुतेगी जो कितनी भी कोशिश करे लेकिन मरते दम तक साथ नहीं छोड़ने वाली।
इसका तात्पर्य है कि हमें किसी दूसरे व्यक्ति की प्रतिष्ठा को धूमिल करते हुए अपनी प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए कार्य नहीं करना चाहिए ऐसा करना गलत है और जो ऐसा कार्य करते हैं वह भले ही ऐसा करके अपने मन में प्रसन्न होते रहें परन्तु एक समय अवश्य आएगा जब उनकी प्रतिष्ठा की धज्जियाँ उड़ जावेगी और यह उनके जीवन में हमेशा के लिए कलंक लगा रहेगा |
इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें सबकी प्रतिष्ठा का ध्यान रखते हुए कार्य करना चाहिए | इसी में हमारी प्रतिष्ठा है |
जय राम जी की
प्रताप भानु शर्मा