रविवार, 9 सितंबर 2018

               (२३) मुखिया मुखु सो चाहिऐ    

मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक |

पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक ||

अर्थ: तुलसीदास जी कहते हैं कि मुखिया मुख के समान होना चाहिए जो खाने-पीने को तो अकेला है, लेकिन विवेकपूर्वक सब अंगों का पालन-पोषण करता है |
     इसका तात्पर्य है की मुखिया अर्थात किसी भी देश,प्रदेश,संस्थान,कार्यालय, परिवार इत्यादि का वह व्यक्ति जिस पर उसकी पूर्ण जिम्मेदारी है, उसको मुख अर्थात मुंह के समान होना चाहिए।  जिस प्रकार केवल एक मुख के द्वारा हम खाना पीना करते हैं जो कि हमारे पूरे शरीर की क्रियाओं को संचालित करने हेतु आवश्यकतानुसार ऊर्जा प्रसारित करता है। यहाँ इस बात पर ध्यान देने की आवश्यकता है कि मुख द्वारा विवेक के अनुसार हमारे शरीर के अंगो का पालन पोषण होता है। मुखिया के आधीन आने वाले सभी सदस्य उसके अंग होते हैं जिनका पालन पोषण एवं उनके हितों की रक्षा विवेक पूर्वक करना मुखिया का कार्य होना चाहिए। सभी पदार्थ खाद्य योग्य  एवं सभी पेय पदार्थ पेय योग्य नहीं हो सकते।  अतः मुखिया को इस बात का ध्यान रखने की आवश्यकता है की वह योग्य पदार्थों का ही सेवन करे।  जिससे उससे संलग्न सदस्य रुपी अंगों का समुचित विकास हो सके।  इसी प्रकार मुखिया के द्वारा कमाया गया धन  भी यदि योग्य है तो ही इससे  सदस्यों के जीवन को आनंदमय बनाया जा  सकता है।  
         अतः गोस्वामी जी द्वारा बताये गए   मुखिया के  गुण जिस मुखिया में होते हैं उससे संलग्न सभी सदस्यों की उत्तरोत्तर प्रगति को कोई नहीं रोक सकता।  

                                                  जय राम जी की   
                                                (प्रताप भानु शर्मा )
     

गुरुवार, 6 सितंबर 2018




(२२)  विधि विपरीत भलाई नाहीं

इहां संभु असमन अनुमाना, दच्छ सुता कहुं नहिं कल्याना
मोरेहु कहें न संसय जाहीं, विधि विपरीत भलाई नाहीं

भावार्थ - इधर शिवजी ने मन में ऐसा अनुमान किया कि दक्ष कन्या सती का कल्याण नहीं दिख रहा है क्योंकि जब मेरे समझाने से भी संदेह दूर नहीं होता तब ऐसा लगता है कि विधि  ही उनके  विपरीत हैं इसलिए सती का कुशल नहीं है।
    तात्पर्य है कि  जब विधि अर्थात कार्य करने की विधि विपरीत हो जाती है तो समझ जाना चाहिए कि भला (अच्छा) होने वाला नहीं है। यदि हम कोई कार्य सम्पन्न करते हैं जिसकी विधि उसकी प्रकृति के अनुसार पूर्व से ही निर्धारित है,  परन्तु हम उस कार्य को विधि अनुसार न करके विपरीत विधि से करते हैं तो उसका परिणाम अच्छा प्राप्त  हो ही नहीं सकता। इसके उदहारण हमारे जीवन में भी  देखे जा सकते हैं।  
    इस चौपाई से एक सन्देश यह भी प्राप्त होता है कि हमें संदेह करना चाहिए परन्तु संदेह होने पर विवेक से काम लेना चाहिए।  संदेह होने पर तुरंत निर्णय लेकर किया गया कार्य हमारे जीवन को नष्ट कर देता है।  अतः विवेक पूर्ण  निर्णय लेकर संदेह को दूर किया जा सकता है। 
          अतः विधि के विपरीत कार्य न कर , और संदेह होने पर विवेक से काम लेने पर आप इस चौपाई के  अर्थ को सार्थक करें। 



                                                 जय राम जी की 
                                           पं.  प्रताप भानु शर्मा 


                               
                                                     
            




बुधवार, 5 सितंबर 2018


(२१)शिक्षक दिवस (०५ सितम्बर)



 बंदउं गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर।।
 
भावार्थ:- मैं उन गुरु महाराज के चरणकमल की वंदना करता हूं, जो कृपा के समुद्र और नर रूप में श्री हरि ही हैं और जिनके वचन महामोह रूपी घने अंधकार का नाश करने के लिए सूर्य किरणों के समूह हैं॥5॥
          इसका तात्पर्य है कि गुरु ही एक ऐसा व्यक्तित्व है जो हमारे अज्ञान रुपी अंधकार को नष्ट कर ज्ञान रुपी ज्योति को  हमारे ह्रदय रुपी पटल पर प्रकाशमान करता है।  गुरु हमारे जीवन में एक पथ प्रदर्शक के रूप में आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करता है।  
        
     गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।
     गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मैटैं न दोष।।

    कबीर दास जि कहते है – हे सांसारिक प्राणीयों। बिना गुरु के ज्ञान का मिलना असंभव है। तब टतक मनुष्य अज्ञान रुपी अंधकार मे भटकता हुआ मायारूपी सांसारिक बन्धनो मे जकडा राहता है जब तक कि गुरु कि कृपा नहीं प्राप्तहोती।
मोक्ष रुपी मार्ग दिखलाने वाले गुरु हैं। बिना गुरु के सत्य एवम् असत्य का ज्ञान नही होता। उचित और अनुचित के भेद का ज्ञान नहीं होता फिर मोक्ष कैसे प्राप्त होगा ? अतः गुरु कि शरण मे जाओ। गुरु ही सच्ची राह दिखाएंगे।
           आज शिक्षक दिवस के अवसर पर समस्त गुरु के चरणों में कोटि कोटि प्रणाम। 
                                                                         (प्रताप भानु शर्मा)
                                         
               
             


बुधवार, 29 अगस्त 2018


 (२०) न कोई ज्ञानी है न मूर्ख
  बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ। जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ॥

भावार्थ- तब महादेव ने हँसकर कहा - न कोई ज्ञानी है न मूर्ख। रघुनाथ जब जिसको जैसा करते हैं, वह उसी क्षण वैसा ही हो जाता है॥ 

     इसका तात्पर्य है कि कोई भी मनुष्य न ज्ञानी है और न ही मूर्ख है, ज्ञानी व्यक्ति भी किसी समय में मूर्खता कर बैठते हैं जिससे उनका जीवन ही संकटग्रस्त हो जाता है।  जबकि मूर्ख व्यक्ति भी कभी इतना ज्ञानी हो जाता है  कि उचित निर्णय लेकर अपना जीवन सुखमय बना लेता है।  आज के परिवेश में भी इस प्रकार के व्यक्ति देखने को मिलते हैं जो  चतुर विद्वान व्यक्ति भी ऐसी भूल कर बैठता है जिससे उसे जीवन भर पछतावा होता है, वह स्वयं भी नहीं समझ पाता कि उससे इस प्रकार की मूर्खता पूर्ण कार्य कैसे हो गया।  इसी प्रकार कोई व्यक्ति मूर्ख समझना भी सही नहीं है, क्योंकि इस प्रकार के व्यक्ति कभी भी विद्वान के रूप में व्यवहार कर उचित निर्णय के उपरांत आनंदमय जीवन व्यतीत करते हैं।  इससे स्पष्ट होता है कि व्यक्ति के ज्ञानी  अथवा मूर्ख होने की स्थिति  सदैव एक समान नहीं रहती, वह किसी भी छण ज्ञानी अथवा मूर्ख की भांति व्यवहार कर सकता है, जो कि उसके कर्म अनुसार  ईश्वर के संचालन नियम के अंतर्गत परिवर्तन चलता रहता है। 

                 जय राम जी की

               पंडित प्रताप भानु शर्मा                             
                                                                                                                                                 जय राम जी की 
                                             पं  प्रताप भानु शर्मा 





शनिवार, 18 अगस्त 2018

        

     (१९)  ऊंच निवासु  नीच करतूति, देखि न सकहि  पराई विभूति 



    श्री रामचरित मानस में   देवताओं ने स्वार्थवश सरस्वतीजी से प्रार्थना कर श्री राम जी को राज तिलक न होकर  बनवास हेतु भेजने का प्रयत्न करने के लिए आग्रह किया।  माँ सरस्वती ने मंथरा के माध्यम से श्री राम को चौदह वर्ष का वनवास करा दिया। देवताओं ने ऊंचे पद पर आसीन होने के उपरांत भी इस प्रकार का कार्य किया जो कि ठीक नहीं समझ आता, परन्तु इसके पीछे देवताओं का  उद्देश्य यही  था  कि  मनुष्य,ऋषि ,मुनि ,की रक्षा हो सके, एवं  अधर्म पर विजय प्राप्त कर धर्म स्थापित हो सके जो कि वनवास के उपरांत ही संभव था। 
   आज के सामाजिक परिवेश में  ऊंचे पद पर आसीन व्यक्ति भी इस प्रकार के कार्य करते हैं जो उनके पद के अनुरूप नहीं होते एवं वे भी अन्य व्यक्तियों की प्रसिद्धि से ईर्ष्या करते हैं।  परन्तु उन्हें इस प्रकार के कृत्य करने के पूर्व निज स्वार्थ को त्यागकर लोकहित तथा परोपकार  के बारे में विचार करना चाहिए  तभी यह चौपाई सार्थक सिद्ध होगी ।
                                    जय राम जी की  
                                   प्रताप भानु शर्मा 
   

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018


(१८) अजेय रथ

         सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका ॥ बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे  

शौर्य और धैर्य उस रथ के पहिए हैं। सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं। बल, विवेक, दम (इंद्रियों का वश में होना) और परोपकार- ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समता रूपी डोरी से रथ में जोड़े हुए हैं॥
      ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना  ॥
          दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा॥
 ईश्वर का भजन ही (उस रथ को चलाने वाला) चतुर सारथी है। वैराग्य ढाल है और संतोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष है॥

     अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना॥
     कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा ॥

निर्मल (पापरहित) और अचल (स्थिर) मन तरकस के समान है। शम (मन का वश में होना), (अहिंसादि) यम और (शौचादि) नियम- ये बहुत से बाण हैं। ब्राह्मणों और गुरु का पूजन अभेद्य कवच है। इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं है॥

         इसका तात्पर्य है कि जो मनुष्य  रामचरित मानस में बताये गए गुण रुपी रथ को धारण करता है, उसे कोई भी शत्रु पराजित नहीं कर सकता।  वह अजेय है। 
                 गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती पर शुभकामना। 
                                                                       जय राम जी की                                                   ( प्रताप भानु शर्मा )




बुधवार, 15 अगस्त 2018


(१७) इन चारों  की बात बिना सोच विचार के मानना चाहिए


* मातु पिता गुर प्रभु कै बानी । 

         बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी ll


भावार्थ:-माता, पिता, गुरु और स्वामी की बात को बिना ही विचारे शुभ समझकर करना (मानना) चाहिए। 


              इसका तात्पर्य है कि माता,पिता,गुरु, और स्वामी इन चारों की बात बिना सोच विचार अर्थात किसी भी तर्क के बिना मानना चाहिए,  क्योकि ये हमारे परम हितेषी होते हैं।  माता-पिता प्रथम गुरु हैं जिनकी शिक्षा हमारे जीवन को सुसंस्कृत बनाती है।  इसके उपरांत गुरु की शिक्षा से हम ज्ञान प्राप्त करते हैं।  इसके अतिरिक्त सबसे महत्वपूर्ण हैं स्वामी अर्थात हमारी आत्मा, जो कि परमात्मा का ही एक अंश है।  अतः हमारी अंतरात्मा की आवाज को सुनकर बिना बिचार किये उसके अनुसार कार्य करना चाहिए।
           अतः इस  चौपाई के माध्यम से यही सन्देश प्राप्त होता है कि इन चारों की बात बिना किसी तर्क के मान लेने पर हमारा अहित नहीं हो सकता।  इनके अतिरिक्त की स्थिति का बर्णन कविराज  गिरिधर द्वारा  इस प्रकार किया  है।
     बिना विचारे जो करै , सो पाछे पछताये।
काम बिगारै आपनो , जग में होत हंसाय।
      अर्थात बिना सोच विचार कर किये गए कार्य को करने के उपरांत परिणाम अनुकूल प्राप्त ना होने पर हमें पश्चाताप होता है,  जिससे हमारी कीर्ति धूमिल होती है। अतः इन चार की बातों के अतिरिक्त सभी की बातों को सोच समझकर विचार करने के उपरांत ही कार्यान्वित रूप देना चाहिए।
                                                                                                    
                                                                                                    जय राम जी की                                   

                    (प्रताप भानु शर्मा)