रविवार, 21 जुलाई 2024

(84)राम नाम महिमा





  ⁠। नाम राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु।
 जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु। ⁠।

भावार्थ-

कलियुग में राम का नाम कल्पतरु और कल्याण का निवास है, जिसको स्मरण करने से भाँग-सा (निकृष्ट) तुलसीदास तुलसी के समान (पवित्र) हो गया॥ 26॥

गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस चौपाई के माध्यम से प्रभु श्री राम के नाम की महिमा को प्रकट किया है। कलियुग अर्थात वर्तमान समय में केवल राम का नाम ही एक ऐसा कल्प वृक्ष है जिससे जो चाहे प्राप्त किया जा सकता है। इसी नाम के प्रभाव से  चित्रकूट  में तुलसीदास जी को हनुमानजी के माध्यम से  प्रभु श्री राम जी के दर्शन प्राप्त हुए एवं आज बाबा तुलसी का अनुपम स्थान है। नाम की महिमा का जितना गुणगान करें, कम है।  

कलयुग केवल नाम अधारा 

सुमिरि सुमिरि नर उतरिही पारा।

कलयुग में केवल नाम का ही आधार है । कलयुग में दान यज्ञ तप करने से जो फल नहीं मिलेगा वह केवल नाम के जाप से मिल जायेगा । अतः नाम सबसे महत्वपूर्ण है ।

जीने की कला= इससे हमे जीने की कला सीखने मिलती है कि। हमे नाम जप करना चाहिए। नाम कोई भी हो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। नाम आपकी पसंद का होना चाहिए । उसका प्रभाव आपके जीवन पर अवश्य पड़ेगा। आपका जीवन खुशहाल हो जायेगा।

जय राम जी की

                पण्डित प्रताप भानु शर्मा


रविवार, 21 जनवरी 2024

(83)राम आवे अवध की ओर सजनी |


 रिपु रन जीति सुजस सुर गावत। सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥

सुनत बचन बिसरे सब दूखा। तृषावंत जिमि पाइ पियूषा॥

भावार्थ:- शत्रु को रण में जीतकर सीता और लक्ष्मण सहित प्रभु आ रहे हैं; देवता उनका सुंदर यश गा रहे हैं। ये वचन सुनते ही भरत सारे दुःख भूल गए। जैसे प्यासा आदमी अमृत पाकर प्यास के दुःख को भूल जाए।
  आज वह दिन आ ही गया है जिसकी प्रतीक्षा सभी सनातनी लगभग 500 वर्षों से कर रहे थे । आज के दिन  विरोधी शक्तियों  से लड़ाई के उपरांत  उन्हें परास्त करने के बाद जगदाधार प्रभु श्री राम अपनी जन्मभूमि में पुनः प्रतिष्ठित होने जा रहे हैं साथ ही बाबा तुलसी दास जी के द्वारा श्री रामचरित मानस की उक्त चौपाइयां भी सार्थक होने जा रही हैं जिसके अनुसार जब प्रभु राम, मां सीता जी और लक्ष्मण जी के साथ  अयोध्या  के नव निर्मित भव्य श्री राम मंदिर में विराजमान हो रहे हैं तब यह उन राम भक्तो की भक्ति रूपी प्यास को बुझाने के लिए अमृत के समान ही है l पिछले कई वर्षों में प्रभु श्री राम जी के जन्मभूमि की लंबी लड़ाई में जो भी त्याग किया है उसके प्रतिफल में आज जो विराट भव्य वैभवशाली मंदिर का निर्माण हुआ है जिसमे राम लला विराजमान हुए है यह कार्य अमृत के समान ही  है जिसने उनके उस प्यास रुपी दुख को दूर करने का कार्य किया है। जिन व्यक्तियों  ने प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से इस कार्य में अपना योगदान दिया है प्रभु  श्री राम के प्राण प्रतिष्ठा के शुभ अवसर पर सभी राम भक्तों को बहुत बहुत बधाईयां। सभी पर प्रभु श्री राम की कृपा दृष्टि बनी रहे सभी को भक्ति का दान प्राप्त हो । इन्हीं मंगल कामनाओं के साथ ।
                  जय राम जी की
          पंडित प्रताप भानु शर्मा



रविवार, 16 जुलाई 2023

(82)बिना विचारे कार्य नहीं करना चाहिए


अनुचित उचित काज कछु होई 
मुझि करिय भल कह सब कोई।
सहसा करि पाछे पछिताहीं,
कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं।।

अर्थ: किसी भी कार्य का परिणाम उचित होगा या अनुचित, यह जानकर करना चाहिए, उसी को सभी लोग भला कहते हैं। जो बिना विचारे काम करते हैं वे बाद में पछताते हैं,  उनको वेद और विद्वान कोई भी बुद्धिमान नहीं कहता।

इसका तात्पर्य है कि किसी कार्य को करने के पूर्व उसके परिणाम के बारे में विचार करना चाहिए बिना विचार के किये  गये  कर्म को करने के बाद पछताना पड़ता है एवम ऐसे व्यक्ति को कोई भी  बुद्धिमान नहीं कहेंगे जबकि जो व्यक्ति सोच समझकर कार्य करता है उसे सभी बुद्धिमान कहते हैं और उसके  कार्य का परिणाम अच्छा ही निकलता है । 

जीने की कला= इस चौपाई के माध्यम से गोस्वामी जी के अनुसार जीवन जीने की कला प्राप्त होती है कि कोई भी कार्य करने के पूर्व विचार करना आवश्यक होता है ।

जय श्री राम जी की
     पंडित प्रताप भानु शर्मा

शुक्रवार, 5 मई 2023

(81)राम कृपा नासहि सब रोगा,

राम कृपा नासहि सब रोगा,
जौं एहि भाँति बनै संजोगा।
सदगुर बैद बचन बिस्वासा,
संजम यह न बिषय कै आसा।



कागभुशुण्डि जी ने गरुण जी को श्री रामचरित मानस में कई मानस रोग बताये तथा यह बताते हुए कहा कि किस प्रकार इन रोगों से बचा जा सकता है)

यदि श्री रामजी की कृपा से इस प्रकार का संयोग बन जाय तो ये सब रोग नष्ट हो जाएंगे । इसके लिए सद्गुरु रूपी वैद्य के वचन में विश्वास हो।विषयो की आशा न करे,यही संयम (परहेज) हो।
इसका तात्पर्य है कि  सद्गुरु रूपी वैद्य के वचनो पर विश्वास हो,उनमे अटूट श्रद्धा हो,तथा हर सम्भव उनके आदर्शो को जीवन में उतारने का दृढ निश्चय हो ,तभी इस प्रकार का संयोग बनता है फिर निश्चित रूप से सद्गुरु की कृपा से इन रोगों का नाश हो सकता है। सद्गुरु के वचनों पर विश्वास होना फिर उनके अनुसार कार्य करना आवश्यक है परंतु शर्त इतनी सी है कि विषय भोग का त्याग करना होगा अर्थात इसका परहेज आवश्यक है तभी ईश्वर की कृपा हम अपने रोगों का शमन कर पाएंगे।
जीने की कला= इससे हमें सीख मिलती है कि यदि हम सद्गुरु के कहे अनुसार कार्य करें और विषय अर्थात काम, क्रोध,लोभ, मोह एवं ईर्ष्या से दूर रहें तो  हम सदैव शारीरिक एवं मानसिक रोग से कभी पीड़ित नहीं होंगे ।,

जय श्री राम जी की
       पंडित प्रताप भानु शर्मा 


बुधवार, 26 अप्रैल 2023

(80) चौदह प्राणी जो कि जीते ही मुरदे के समान हैं।


रामचरितमानस

सदा रोगबस संतत क्रोधी।          बिष्नु बिमुख श्रुति संत बिरोधी॥

तनु पोषक निंदक अघ खानी।
जीवत सव सम चौदह प्रानी

भावार्थ

नित्य का रोगी, निरंतर क्रोधयुक्त रहने वाला, भगवान विष्णु से विमुख, वेद और संतों का विरोधी, अपने ही शरीर का पोषण करने वाला, पराई निंदा करने वाला और पाप की खान (महान पापी) -  चौदह प्राणी जीते ही मुरदे के समान हैं।

  यह चौपाई श्री रामचरित मानस के लंका कांड से अंगद रावण संवाद  की है जिसमें उपरोक्तानुसार 14 प्रकार के व्यक्तियों को जीते जी मुर्दे के समान बताया गया है ।। आप स्वयं अपना आंकलन कर के देख सकते हैं कि आप जिंदा हैं या मुर्दा के समान । मृत व्यक्ति किसी का भला कर सकता है क्या ? अतः सबसे पहले स्वयं जीवित हों फिर अपने समाज और आस पास के व्यक्तियों को अपने सनातन धर्म के प्रति जीवित करके सच्चे सनातनी होने का परिचय देवें |

  जय राम जी की।

जय परशुराम  ।

                      पंडित प्रताप भानु शर्मा 


बुधवार, 12 अप्रैल 2023

(79)सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ।


 सेवक कर पद नयन से  मुख सो साहिबु होइ।
तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ॥


भावार्थ == सेवक हाथ, पैर और नेत्रों के समान और स्वामी मुख के समान होना चाहिए।तुलसीदासजी कहते हैं कि सेवक-स्वामी की ऐसी प्रीति की रीति सुनकर सुकवि उसकी सराहना करते हैं॥

इसका तात्पर्य है कि स्वामी को मुख के समान एवं सेवक को हाथ, पैर और आंखो की तरह माना गया है   जिस प्रकार सेवक अपने हाथ पैर और नेत्रों का उपयोग करते हुए अपने स्वामी के लिए जेवीकोपर्जन हेतु खाद्य सामाग्री की व्यवस्था करता है और इन अंगो का उपयोग विपत्ति के समय स्वामी की रक्षा हेतु करता है। इसी प्रकार स्वामी अर्थात् मालिक  अपने सेवक के लिए  मुख के अनुसार कार्य करते हुए    सभी अंगों को पोषित करता है और उन्हें शक्तिशाली बनाता है। अर्थात सेवक का ध्यान रखना स्वामी का कर्तव्य है।
जीने की कला= इस दोहे में गोस्वामीजी ने स्वामी और सेवक के समन्वय को प्रस्तुत किया है । यदि स्वामी मुख की तरह और सेवक हाथ पैर और आंख की तरह होते हैं तभी उनमें समन्वय बना रह सकता है इससे शिक्षा लेकर हम स्वामी और सेवक का कर्तव्य सही प्रकार से पूर्ण कर सकते 
है ।

            जय राम जी की 
               पंडित प्रताप भानु शर्मा

सोमवार, 3 अप्रैल 2023

(78)सेवक सठ नृप कृपन कुनारी।

       सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। 

       कपटी मित्र सूल सम चारी॥ 




भावार्थ:- मूर्ख सेवक, कंजूस राजा, कुलटा स्त्री और कपटी मित्र- ये चारों शूल के समान पीड़ा देने वाले हैं। 

   
     इसका तात्पर्य है कि यदि सेवक मूर्ख है तो वह सदैव अपने स्वामी को कष्ट पहुंचाता रहेगा । यदि राजा कंजूस है तो उसकी प्रजा सदैव कष्ट में ही रहेगी क्योंकि वह प्रजा के सुख को ध्यान में रखते हुए कार्य नहीं करता जबकि धन बचाने की इच्छा रखता है। इसी प्रकार जिसकी पत्नी चरित्रहीन है वह सदैव पति के लिए कष्ट पहुंचाती रहेगी। यदि मित्र कपटी अर्थात कपट पूर्ण व्यवहार रखने वाला है तो वह भी अपने सच्चे मित्र के लिए पीड़ादाई होता है ।  इसके विपरीत व्यवहार करने वाले राजा, स्त्री, मित्र और सेवक को सभी चाहते हैं।


जीने की कला = इस चौपाई के माध्यम से हमें सीख मिलती है कि सेवक, राजा, स्त्री और मित्र के अवगुणों को ध्यान में रखते हुए  उनकी अपेक्षा करने में ही हमारी भलाई होती है।

                   जय राम जी की 
                     पंडित प्रताप भानु शर्मा 

शनिवार, 25 फ़रवरी 2023

(77) सेवा और समर्पण

 सिर भर जाउँ उचित अस मोरा। सब तें सेवक धरमु कठोरा॥ देखि भरत गति सुनि मृदु बानी। सब सेवक गन गरहिं गलानी॥

        






भावार्थ - मुझे उचित तो ऐसा है कि मैं सिर के बल चलकर जाऊँ। सेवक का धर्म सबसे कठिन होता है। भरतजी की दशा देखकर और कोमल वाणी सुनकर सब सेवकगण ग्लानि के मारे गले जा रहे हैं॥

इसका तात्पर्य है कि सेवक का धर्म सबसे कठोर है क्योंकि सेवक को अपने स्वामी के प्रति समर्पण का भाव  होने पर ही  सेवा करने की भावना उत्पन्न होती है । सेवा ,समर्पण का ही  प्रतिरूप है । सच्चा सेवक वह है जो केवल अपने स्वामी के प्रति समर्पित हो । स्वामी की इच्छा में ही उसकी इच्छा हो । उसको अपनी इच्छाओं का त्याग करना पड़ता है अतः यह सर्वथा उचित है कि सेवक का धर्म सबसे कठोर है । सेवा के अंतर्गत लोक सेवा भी आती है जिसमें सभी नेतागण सम्मिलित हैं यदि वह भी भरत जी को अपना आदर्श बनाकर जन सेवा करते हैं  तब उनका नाम इस लोक में सदैव याद किया जाएगा  ।

जीने की कला= इस चौपाई के माध्यम से गोस्वामी जी ने सेवक के धर्म को कठोर बताया है परंतु हमारे जीवन में सेवा भाव होना अति आवश्यक है यही भाव मनुष्य होने को यथार्थ सिद्ध करता है।

जय रामजी की

पंडित प्रताप भानु शर्मा 



शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2023

(76) उन्नति में बाधक "मोह"

मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥

काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा॥


अर्थ=सब रोगों की जड़ मोह (अज्ञान) है। इस व्याधि से फिर और बहुत से शूल उत्पन्न होते हैं। जैसे, काम, वात, लोभ, अपार (बढ़ा हुआ) कफ है और क्रोध पित्त है, जो सदा छाती जलाता रहता है। ऐसे लोग जीवन में कुछ नहीं कर पाते। हमेशा आगे बढ़ने के लिए इन चीजों को त्यागना जरूर पड़ता है।

इसका तात्पर्य है कि जीवन में उन्नति का सबसे बड़ा अवरोधक मोह अर्थात अज्ञान ही है l इससे ही  कष्ट उत्पन्न होते हैं। गोस्वामी जी ने हमारे भीतर के शत्रु काम की तुलना वात विकार लोभ की तुलना कफ और क्रोध की तुलना पित्त से करते हुए कहा है कि व्यक्ति के मोह के कारण यह तीनों दोष प्रकट हो जाते हैं और उस व्यक्ति को सदैव कष्ट पहुंचाते रहते हैं ।

जीने की कला = इससे हमे जीने की कला सीखने को मिलती है कि हमें मोह का सर्वथा त्याग करना चाहिए क्योंकि यही हमारे जीवन की उन्नति में बाधक है साथ ही काम क्रोध लोभ भी मोह से ही उत्पन्न होते हैं अतः सबकी जड़ मोह रूपी अज्ञान ही है जिसके त्याग से ही हमारे जीवन में उन्नति होगी।


जय राम जी की ।

           पंडित प्रताप भानु शर्मा

बुधवार, 25 जनवरी 2023

(75) नौ प्रकार के व्यक्तियों की बात तुरंत माने




तब मारीच हृदयँ अनुमाना। नवहि बिरोधें नहिं कल्याना।।

सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी। बैद बंदि कबि भानस गुनी।।

 

अर्थ - इस दोहे में गोस्वामी जी ने मारीच की सोच बताई है कि हमें किन लोगों की बातों को तुरंत मान लेना चाहिए। अन्यथा प्राणों का संकट खड़ा हो सकता है। इस दोहे के अनुसार शस्त्रधारी, हमारे राज जानने वाला, समर्थ स्वामी, मूर्ख, धनवान व्यक्ति, वैद्य, भाट, कवि और रसोइयां, इन लोगों की बातें तुरंत मान लेनी चाहिए। इनसे कभी विरोध नहीं करना चाहिए, अन्यथा हमारे प्राण संकट में आ सकते हैं।

    इसका तात्पर्य है कि निम्न नौ प्रकार के व्यक्तियों की बात को मान लेना ही हमारे लिए हितकर है अन्यथा हमे परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

1 जिसके पास शस्त्र है।

2 जो व्यक्ति हमारी गुप्त बातों को जानता है।

3 जो व्यक्ति समर्थ है हमारा स्वामी है अर्थात प्रमुख है ।

4 जो व्यक्ति मूर्ख है ।

5 जो व्यक्ति धनवान है ।

6 जो व्यक्ति चिकित्सक  (डाक्टर) है।

7 जो व्यक्ति भाट है अर्थात हमारी बढ़ाई करने वाला है।

8 जो व्यक्ति कवि है।

9 जो व्यक्ति हमारा रसोइया है ।

जीने की कला - इससे हमे जीने की कला सीखने मिलती है कि हमें उपरोक्त  से दुश्मनी नहीं करना चाहिए बल्कि इनकी बातों को मान लेना चाहिए इसी में हमारी भलाई है।


जय राम जी की ।

                  पंडित प्रताप भानु शर्मा 

                     



बुधवार, 5 अक्टूबर 2022

(74)धन संपत्ति एवं लक्ष्मी प्राप्ति हेतु मूल मंत्र




संसार में हर कोई धन प्राप्त करना चाहता है और इसके लिए प्रयासरत भी रहता है  कोई इतना धन पाना चाहता है कि उसकी आने वाली पीढ़ियां भी सुख भोग सकें अथवा कोई केवल इतना धन चाहता है जिससे उसके परिवार का भरण पोषण अच्छी तरह होता रहे परंतु  हर किसी को जीवन-यापन के लिए धन की आवश्यकता बनी रहती है ।

शास्त्रों के अनुसार लक्ष्मी प्राप्त करने हेतु उद्यम अर्थात किसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निरंतर  प्रयास करना ही है परंतु हमारा परिश्रम सफल हो इसके लिए प्रभु की कृपा की आवश्यकता है जिसे प्राप्त करने हेतु हमारे शास्त्रों में कई मंत्र बताए गए हैं  धन संपत्ति प्राप्ति एवं दरिद्रता दूर करने हेतु  चौपाई के रूप में मंत्र इस प्रकार है:

'जिमि सरिता सागर महुं जाही।
जद्यपि ताहि कामना नाहीं।।
तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएं।
धरमसील पहिं जाहिं सुभाएं।।'

यह मंत्र श्री रामचरित मानस के बालकांड से लिया गया है. इसका तात्पर्य है कि नदियां बहती हुई सागर की ओर ही जाती हैं, चाहे उनके मन में उधर जाने की कामना हो या नहीं. ठीक उसी तरह, सुख-संपत्ति भी बिना चाहे ही धर्मशील और विचारवान लोगों के पास चली आती हैं.

जीने की कला = इस चौपाई के माध्यम से हमें सीख मिलती है कि जब हम अपने धर्म का अनुसरण करते हुए किसी भी कार्य को सोच विचार कर करेंगे तो हमें निश्चित ही धन एवं  सफलता प्राप्त होगी ।

                 जय राम जी की

                दशहरे की शुभकामनाएं ।


                     पंडित  प्रताप भानु शर्मा




रविवार, 25 सितंबर 2022

(73)खल परिहास होइ हित मोरा।

 

खल परिहास होइ हित मोरा।

काक कहहिं कलकंठ कठोरा।। 
हंसहि बक दादुर चातकही।
हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही 

दुष्टों के हंसने से मेरा हित ही होगा मधुर कण्ठ वाली कोयल को कौए तो कठोर ही कहा करते हैं जैसे बगुले हंस पर और मेंढक पपीहे पर हँसते रहते  हैं, वैसे ही मलिन मन वाले दुष्ट निर्मल वाणी पर हँसते हैं. इस तरह दुष्टों के मुख से जो दूषण निकलेंगे वह भी संतों के भूषण हो जाएंगे.

   
 तात्पर्य है कि जब हमारे द्वारा कोई अच्छा कार्य किया जाता है तब दुष्ट प्रवृत्ति के व्यक्ति हंसी उड़ाते है क्योंकि वह नहीं चाहते कि कोई अच्छा कार्य करे जिससे उनका जमा हुआ साम्राज्य खतरे में पड़े जो  कि उन्होने केवल झूठ के सहारे से ही स्थापित किया है । दुष्टों के हंसने से संत प्रवृत्ति के व्यक्तियों का केवल हित ही होता है वह जो भी दुष्टता करते  हैं वह सज्जनता में परिवर्तित हो जाती है ।
जीने की कला= इन चौपाइयों के माध्यम से हमें सीख मिलती है कि जब हमारे ऊपर कोई हंसता है हमारा मजाक उड़ाता है तब उसकी हंसी मजाक भी हमारे लिए वरदान बन जाती है जिससे हमारा कार्य निश्चित ही सफल होता है ।     
                                        जय रामजी की
               
 पण्डित प्रताप भानु शर्मा



      
          
   
               
  

गुरुवार, 8 सितंबर 2022

(72)माता पिता गुरु और स्वामी की शिक्षा का पालन ।


मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहिं सुभायँ।

लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ॥

भावार्थ:-जो लोग माता, पिता, गुरु और स्वामी की शिक्षा को स्वाभाविक ही सिर चढ़ाकर उसका पालन करते हैं, उन्होंने ही जन्म लेने का लाभ पाया है, नहीं तो जगत में जन्म व्यर्थ ही है॥

   इसका तात्पर्य है कि जो लोग  माता, पिता, गुरु, स्वामी से प्राप्त शिक्षा को सदैव अपने स्मरण में रखते हैं एवम उसका पालन करते है, उनका ही जीवन सफल हो जाता है  जबकि ऐसा न होने पर  जीवन  व्यर्थ हो जाता है । माता पिता को प्रथम गुरु माना गया है जो कि अपनी संतान को बचपन से ही शिक्षा देकर जीवन में जीने का ज्ञान प्रदान करते है इसके बाद गुरु आध्यात्मिक चेतना जाग्रत करने का कार्य करते हैं  साथ ही स्वामी अर्थात आपकी अंतरात्मा जो कि सदैव सही बात ही विचार के माध्यम से प्रकट करती है जिसे हम परमात्मा की आवाज मान सकते हैं जो कि जगत के स्वामी है । अतः इनकी शिक्षा को स्वाभाविक ही मान कर पालन करना चाहिए ।

जीने की कला = गोस्वामी तुलसीदास जी की इस चौपाई से सीख मिलती है कि हम सब को माता पिता गुरु और स्वामी की शिक्षा का अवश्य ही पालन करना चाहिए इसी में हमारी भलाई है ।

    जय राम जी की  ।

           पंडित प्रताप भानु शर्मा




रविवार, 4 सितंबर 2022

(71) मूर्ख का ह्रदय

 

फूलइ फरइ न बेंत जदपि सुधा बरषहिं जलद।
मूरख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम ॥ 



भावार्थ

यद्यपि बादल अमृत जैसा जल बरसाते हैं तो भी बेत फूलता-फलता नहीं। इसी प्रकार चाहे ब्रह्मा के समान भी ज्ञानी गुरु मिलें, तो भी मूर्ख के हृदय में चेत (ज्ञान) नहीं होता॥ 


इसका तात्पर्य है कि चाहे अमृत की वर्षा हो फिर भी बैंत  के वृक्ष में फल और फूल नहीं लगते। ऐसे ही जो व्यक्ति प्रवचन ,कथाएं , संत वाणी एवं ईश्वर के सम्मुख ले जाने वाले पथ से संबंधित चर्चा सुनने के उपरांत भी इस प्रकार के मूर्ख लोगों पर  कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता  वह इनकी हंसी उड़ाने से भी पीछे नहीं रहते इस प्रकार के धूर्त व्यक्ति उन पंडितों , कथा वाचकों  के विरुद्ध अपमान जनक शब्दों का प्रयोग करते हुए उनके कथनों को ढोंग बताते हैं पैसे ऐंठने का तरीका बताते हैं इस प्रकार के चपल अधर्मी व्यक्तियो को साक्षात ब्रह्मा भी ज्ञान देने इस पृथ्वी पर आ जाएं फिर भी वह नहीं समझेंगे । 
जीने की कला_ गोस्वामी जी के इस दोहे से शिक्षा मिलती है कि हमें अपने हृदय को  कोमल  एवं बुद्धि को तर्कहीन बनाना चहिए जिससे हम ईश्वर के संबंध में ज्ञान प्राप्त कर अपना जीवन सफल बना सकें ।

जय राम जी की
             पंडित प्रताप भानु शर्मा
 

रविवार, 28 अगस्त 2022

(70)मनुष्य के रूप में राक्षस कौन है

 

पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद।

ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद ।।


अर्थ

वे दूसरों से द्रोह करते हैं और पराई स्त्री, पराए धन तथा पराई निंदा में आसक्त रहते हैं। वे पामर और पापमय मनुष्य नर शरीर धारण किए हुए राक्षस ही हैं॥

इसका तात्पर्य है कि आजके सामाजिक  परिवेश में कुछ व्यक्ति इस प्रकार के देखने को मिलते हैं जो द्रोह करने में ही आनंदित होते है वह सदैव द्रोह करने का कारण ही खोजते रहते हैं । पराई स्त्री के प्रति आकर्षित रहते हैं । दूसरे के धन को प्राप्त करने की चेष्टा करते रहते है और सदैव दूसरे की निंदा में ही लगे रहते हैं इस प्रकार के अत्यधिक दुष्ट अधम व्यक्ति मनुष्य शरीर में रहते हुए भी राक्षस ही हैं 

जीवन जीने की कला= इस दोहे के माध्यम से गोस्वामी जी ने राक्षस को परिभाषित किया है इससे हमें शिक्षा मिलती है कि जिन व्यक्तियों में इस प्रकार के  दुर्गुण दिखाई देवें तो उन्हें दूर करते हुए एक अच्छा मनुष्य बनाकर उनके जीवन को सफल बनाना चाहिए । इसी में उनकी भलाई है । अच्छे मनुष्यों को इस प्रकार के व्यक्तियों को शिक्षा के माध्यम से उनके  दुर्गुणों को दूर करने का प्रयास करते रहना चाहिए जिससे समाज सुधार हो सके ।

          जय राम जी की। 

          पंडित प्रताप भानु शर्मा 



रविवार, 21 अगस्त 2022

(69) संत के गुण



संत असंतन्हि कै असि करनी।

जिमि कुठार चंदन आचरनी॥

काटइ परसु मलय सुनु भाई।

निज गुन देइ सुगंध बसाई॥

ताते सुर सीसन्ह चढ़त,

जग बल्लभ श्रीखंड।

अनल दाहि पीटत घनहिं,

परसु बदन यह दंड॥

 अर्थ=संत और असंतों की करनी ऐसी है जैसे कुल्हाड़ी और चंदन का आचरण होता है। हे भाई! सुनो, कुल्हाड़ी चंदन को काटती है (क्योंकि उसका स्वभाव या काम ही वृक्षों को काटना है), किंतु चंदन अपने स्वभाववश अपना गुण देकर उसे (काटने वाली कुल्हाड़ी को) सुगंध से सुवासित कर देता है।

इसी गुण के कारण चंदन देवताओं के सिरों पर चढ़ता है और जगत्‌ का प्रिय हो रहा है और कुल्हाड़ी के मुख को यह दंड मिलता है कि उसको आग में जलाकर फिर घन से पीटते है।


इन चौपाइयों में गोस्वामी जी ने संत स्वभाव के व्यक्ति की तुलना चंदन से और असंत की तुलना कुल्हाड़ी से करी है जिस प्रकार असंत व्यक्ति संत व्यक्ति को परेशान करने  का प्रयास करता है तब संत स्वभाव व्यक्ति अपने स्वभाव वश  असंत को  भी महका देते हैं जबकि असंत व्यक्ति को स्वभाव अनुसार दंड मिलना निश्चित है ।

 जीने की कला= श्री राम चरित मानस की इन चौपाइयों के माध्यम से सीख मिलती है कि हमें अपने निज  संत स्वभाव में रहकर  सभी को महकाते हुए असंत को भी संत बनाने का प्रयास करना चाहिए ।

     जय राम जी की

             पंडित प्रताप भानु शर्मा


 

बुधवार, 17 अगस्त 2022

(68) दूसरों को दोष न देवें ।

नयन दोस जा कहॅ जब होइ, पीत बरन ससि कहुॅ कह सोई।

जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा, सो कह पच्छिम उपउ दिनेसा ।।

अर्थ तुलसीदासजी कहते हैं कि जब किसी के आँख में दोष होता है तो उसे चाँद पीले रंग का दिखाई देता है और जब पक्षी के राजा को दिशाओं का भ्रम हो जाता है तो उसे सूर्य पश्चिम में उदय होता हुआ दिखाई देता हैं।

 इसका तात्पर्य है कि जब किसी व्यक्ति में दोष होता है तब उसे दोष ही नजर आते हैं अर्थात जो दिखाई देता है वह होता नही है जिस प्रकार दृष्टि दोष होने पर चंद्रमा  का रंग पीला दिखाई देता है इसी प्रकार जब पक्षी राज गरूड उड़ते उड़ते दिशा से भटक जाता है तो उसे सूर्य पूर्व की जगह पश्चिम से उदय होता दिखाई देता है । अतः किसी के दोष देखना और उसे दोषी बनाना सर्वथा अनुचित होता है क्योंकि दोष हम में ही होते है जिससे हमारे सामने वाला निर्दोष होते हुए भी दोषी प्रतीत होता है ।

जीने की कला= इस दोहे के माध्यम से गोस्वामी जी हमे सीख देना चाहते हैं कि जब हम किसी के दोष देखते हैं तब वास्तव में दोष उसमे नहीं हमारी दृष्टि में ही होता है । अतः हमें किसी को दोषपूर्ण दृष्टि से नही देखना चाहिए ।

  जय राम जी की 

          पंडित प्रताप भानु शर्मा

 


सोमवार, 15 अगस्त 2022

(67)कोउ नृप होउ हमहिं का हानि

 कोउ नृप होउ हमहिं का हानि ।

चेरी छाडि अब होब की रानी ॥


अर्थ:- कोई भी राजा हो जाये-हमारी क्या हानि है ? मैं अभी दासी हूँ तो नए राजा के बनने से दासी से क्या भला रानी बन जाऊंगी !

इसका तात्पर्य है कि कुछ व्यक्तियों की सोच रहती है कि राजा कोई भी हो इससे हमें क्या अंतर पड़ता है हम जैसे हैं वैसे रहेंगे इससे हमारी जीवन शैली नही बदलने वाली है । इस प्रकार की तुच्छ मानसिकता से ग्रस्त व्यक्ति ही इस राष्ट्र के लिए हानि पहुंचाने के लिए उत्तरदायी हैं । राजा जैसा होता है प्रजा भी वैसी ही होती है  यथा राजा तथा प्रजा । राजा की सोच से ही हमारा राष्ट्र अकल्पनीय उन्नति की ओर अग्रसर हो सकता है   अतः राजा चुनते समय सावधान रहने की आवश्यकता है न कि इस प्रकार की सोच के साथ किसी को भी राज्य सौंप कर होने वाले परिणामों को देखना ।

जीने की कला = यह उस मानसिकता का परिचायक सूत्र वाक्य है जहाँ व्यक्ति को तब तक फर्क नहीं पड़ता जब तक आंच उस तक नहीं आ जाये । जब बात खुद पर आती है फिर विरोध करने की हिम्मत नहीं रह जाती..! अतः किसी भी कार्य में स्वयं की सहभागिता निश्चित करना आवश्यक है भले ही वह कार्य आपको प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित न करे।

आजादी के ७५ वर्ष आज पूर्ण हुए हैं जिसे हम अमृत महोत्सव के रूप में मना रहे हैं । आज हम सब शपथ ग्रहण करें कि हम अपने देश के लिए ऐसे सभी कार्य करेंगे जो देश हित में हों । स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं । जय हिंद जय भारत ।

       जय राम जी की    ।

        पंडित प्रताप भानु शर्मा

गुरुवार, 11 अगस्त 2022

(66)दिखावे से दूर रहना चहिए

 

तनु गुन धन महिमा धरम,।  तेहि बिनु जेहि अभियान।      तुलसी जिअत बिडंबना, परिनामहु गत जान।।




अर्थ- तन की सुंदरता, सद्गुण, धन, सम्मान और धर्म आदि के बिना भी जिन्हें अभिमान होता है, ऐसे लोगों का जीवन ही दुविधाओं से भरा होता है, जिसका परिणाम बुरा ही होता है।
 
  इसका तात्पर्य है कि आज के सामाजिक परिवेश में कुछ व्यक्ति सुंदर नहीं होते हुए भी अपने आपको सुंदर समझते हैं इसी प्रकार गुणी न होने पर गुणी,  धन न होने पर भी धनी मान न होने पर भी सम्मानित , धर्म का पालन न करने पर भी स्वयं को धार्मिक समझकर अभिमान करते हैं । गोस्वामी जी कहते हैं इस प्रकार के व्यक्तियों का जीवन सदैव समस्याओं से घिरा रहता है और अंत में उसका परिणाम कष्टप्रद रहता है ।
  
जीने की कला = वर्तमान समय में एक कहावत चलती है, कि जो दिखता है, वह बिकता है। ऐसे में तुलसीदास जी ने दिखावे के पीछे भागने वालों के लिए भी अपने इस दोहे में शिक्षा दी है कि हमको दिखावे से दूर रहकर वास्तविकता में रहना चाहिए अन्यथा हम परेशानी में पड़ सकते हैं ।

      जय राम जी की

      पंडित प्रताप भानु शर्मा